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बिग ब्रेकिंग : जशपुर में "जनसंपर्क" का नया मॉडल - खबर छापो तो 'अपराधी', सवाल पूछो तो '1 करोड़' का नोटिस!

द्वारा: SURGUJA TIMESप्रकाशित: 18 जनवरी 2026दे देखा गया: 253 बार
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सरगुजा । जशपुर/घरघोड़ा । विशेष रिपोर्ट छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में "जनसंपर्क" (Public Relations) की परिभाषा का आधुनिक संस्करण लॉन्च हो गया है। अब तक हमें लगता था कि पीआरओ (PRO) का काम सरकार और जनता/प्रेस के बीच मधुर संबंध बनाना है, लेकिन जशपुर क...

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सरगुजा । जशपुर/घरघोड़ा । विशेष रिपोर्ट

छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में "जनसंपर्क" (Public Relations) की परिभाषा का आधुनिक संस्करण लॉन्च हो गया है। अब तक हमें लगता था कि पीआरओ (PRO) का काम सरकार और जनता/प्रेस के बीच मधुर संबंध बनाना है, लेकिन जशपुर की सहायक संचालक साहिबा ने नई नियमावली लिख दी है। नया नियम सरल है: अगर आप हमारे विभाग की पोल खोलेंगे, तो हम न्यायालय का इंतजार नहीं करेंगे, हम व्हाट्सएप ग्रुप में ही आपको 'अपराधी' घोषित कर देंगे!जी हाँ, यह कोई मजाक नहीं, बल्कि जशपुर की हकीकत है। पत्रकार ऋषिकेश मिश्रा ने अब इस "नवाबी फरमान" के खिलाफ असली न्यायालय (घरघोड़ा कोर्ट) का दरवाजा खटखटाया है।*पत्रकार का "घोर अपराध" : सच लिखना!

अरे भाई! पत्रकार ने गलती तो की ही थी। उसने बस इतना ही तो छापा था कि जनसंपर्क कार्यालय के एक कर्मचारी (रविंद्रनाथ राम) ने प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या की कोशिश की। अब आप ही बताइये, सरकारी दफ्तर में प्रताड़ना होना तो "रोज़मर्रा का कामकाज" है। इसे खबर बनाकर छापना और विभाग की नींद खराब करना "देशद्रोह" से कम है क्या?20 अगस्त को कर्मचारी ने थाने में लिखित शिकायत दी, 2 सितंबर को पत्रकार ने खबर छापी... और बस, यहीं से 'साहिबा' का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया।

व्हाट्सएप बना 'सुप्रीम कोर्ट' :

परिवाद के अनुसार, खबर छपते ही साहिबा ने जज, जूरी और जल्लाद की भूमिका एक साथ निभा ली। उन्होंने भारतीय संविधान और आईपीसी (अब बीएनएस) को दरकिनार करते हुए, सरकारी व्हाट्सएप ग्रुप में पत्रकार महोदय को "अपराधी" की उपाधि से नवाज दिया।

जहाँ बड़े-बड़े कलेक्टर और एसपी जुड़े हों, वहाँ किसी को अपराधी कह देना— इसे कहते हैं "पावर का नशा"। साहिबा शायद भूल गईं कि अपराधी घोषित करने का काम जज का होता है, जनसंपर्क अधिकारी का नहीं। लेकिन जब 'अहंकार' सर चढ़कर बोलता है, तो कानून की किताबें सिर्फ पेपरवेट लगने लगती हैं।

एक करोड़ का मानहानि नोटिस : हंसी का पात्र कौन?

व्यंग्य की पराकाष्ठा देखिये। आरोप है कि अपनी छवि (जो कर्मचारी की आत्महत्या के प्रयास से पहले ही धूमिल हो रही थी) को बचाने के लिए मैडम ने पत्रकार को 1 करोड़ रुपये की मानहानि का नोटिस भेज दिया।

मानो कह रही हों - "तुमने सच छापकर मेरी नाक कटवा दी, अब 1 करोड़ लाओ ताकि मैं प्लास्टिक सर्जरी करवा सकूं।" पत्रकार ने भी जवाब दे दिया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकारी कुर्सी पर बैठकर पत्रकारों को डराना ही अब 'जनसंपर्क' का हिस्सा है?

सिस्टम 'कोमा' में, पत्रकार कोर्ट में :

पत्रकार ने पुलिस अधीक्षक से लेकर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक को चिट्ठी लिखी। लेकिन सरकारी सिस्टम को लकवा मार गया है। न कोई जांच, न कोई कार्रवाई। मानो अधिकारी एक-दूसरे की पीठ खुजाने में व्यस्त हैं।

थक-हारकर पत्रकार ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 और भारतीय न्याय संहिता 2023 की भारी-भरकम धाराओं (308, 356, 352, 351) के साथ घरघोड़ा न्यायालय में परिवाद दायर किया है।

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कलम बनाम अहंकार :

अब मामला न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में है। देखना दिलचस्प होगा कि क्या व्हाट्सएप पर बांटी गई "अपराधी" की डिग्री असली अदालत में टिक पाती है? या फिर सरकारी पद का दुरुपयोग करने वालों को यह समझ आएगा कि पत्रकार "चरणचुंबक" नहीं, बल्कि आईना होते हैं - और आईना तोड़ने से चेहरा सुंदर नहीं हो जाता।

बड़ा सवाल: क्या जशपुर प्रशासन को अब यह समझने के लिए ट्यूशन लेनी पड़ेगी कि "आलोचना" और "अपराध" में अंतर होता है?

ऐसे मामलों को टालना ख़तरनाक, इससे अफसरों का मनोबल बढ़ता है”

वरिष्ठ पत्रकार कुमार जितेन्द्र का तीखा बयान

जिला जनसंपर्क कार्यालय से जुड़े पत्रकार मानहानि प्रकरण को लेकर वरिष्ठ पत्रकार कुमार जितेन्द्र ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि इस तरह के मामलों को हल्के में लेना या टालना बेहद ख़तरनाक है, क्योंकि इससे सत्ता और पद का दुरुपयोग करने वाले अधिकारियों का मनोबल और बढ़ जाता है।

कुमार जितेन्द्र ने स्पष्ट शब्दों में कहा—

एक पत्रकार नोटिस और मानहानि तक तो किसी तरह झेल लेता है, लेकिन इससे आगे बढ़कर षड्यंत्र रचते हुए झूठे आरोप लगाकर कई पत्रकारों को जेल भिजवाया जा चुका है। यह कोई सामान्य बात नहीं है, बल्कि प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है।

उन्होंने कहा कि यह मामला केवल एक पत्रकार का व्यक्तिगत संघर्ष नहीं है, बल्कि पूरे पत्रकार समुदाय के सम्मान और अधिकारों से जुड़ा हुआ है।

इस प्रकरण को नजीर बनाना बेहद ज़रूरी है, ताकि एक कर्मचारी या अधिकारी यह समझ सके कि वह जनता का नौकर है, मालिक नहीं। सत्ता का घमंड लोकतंत्र और पत्रकारिता—दोनों के लिए घातक होता है।

वरिष्ठ पत्रकार ने न्यायालय और प्रशासन से अपेक्षा जताई कि ऐसे मामलों में कठोर और समयबद्ध कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई भी अधिकारी पद और ताकत के बल पर पत्रकारों को डराने या बदनाम करने का साहस न कर सके

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